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गुरुवार, 3 नवंबर 2016

दोषपूर्ण सामग्री व सेवा में कमी एवं उपभोक्ता अधिकार,

दोषपूर्ण सामग्री व सेवा में कमी एवं उपभोक्ता अधिकार,
CONTENTSदोहरा नुकसानदोषपूर्ण सामग्री व सेवा में कमी की परिभाषादोषपूर्ण सामग्री व सेवासामग्री का आशयसेवाउपभोक्ताओं के कल्याण हेतु बनाए गए कुछ महत्वपूर्ण कानूनभारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872वस्तु बिक्री अधिनियम, 1930खाद्य अप-मिश्रण उन्मूलन अधिनियम, 1955ट्रेड तथा मर्केन्डाइज अधिनियम, 1958काला बाजारी अवरोधक एवं आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1980एकाधिकार एवं अवरोधक व्यापार व्यवहार (Monopolies and Resteuctive Trade Practices Act) अधिनियम,1969
दोहरा नुकसान
वर्तमान व्यावसायिक युग में नैतिकता का पक्ष पीछे छूटता जा रहा है। आज उत्पादकों एवं विपणनकर्ताओं द्वारा अधिक लाभ कमाने की लालसा और इच्छा से वस्तुओं में विभिन्न प्रकार के हानिकारण पदार्थों का मिश्रण किया जा रहा है। इसके साथ ही भ्रामक विज्ञापनों के माध्यम से वस्तुओं और सेवाओं की गुणवत्ता के संबंध में अतिरंजित दावे किए जाते हैं। कई बार इनके प्रभाव में आकर उपभोक्ता इन वस्तुओं एवं सेवाओं का प्रयोग करने लगता है, जिससे उसे धन और जीवन के रूप में दोहरा नुकसान उठाना पड़ता है। ऐसी स्थिति में उसे समझ में नहीं आता है कि वह क्या करें? उपभोक्ताओं की जागरूकता के लिए इस अध्याय में कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां दी जा रही हैं जिसका लाभ उठाकर वह जागरूक उपभोक्ता बन सकता है और ऐसे अनुचित व्यापारिक पद्धतियों से बच सकता है तथा किसी प्रकार की समस्या होने पर संबधित कानूनों की मदद से लाभ प्राप्त कर सकता है।
दोषपूर्ण सामग्री व सेवा में कमी की परिभाषा
दोषपूर्ण सामग्री व सेवा
तत्कालीन नियम, विनियम, एवं कानून के अन्तर्गत वस्तुओं की गुणवत्ता, माप, असर, शुद्धता या मापदण्डों में त्रुटि, अपूर्णता अथवा कमी जो विक्रेता द्वारा किए गए दावे के अनुसार नहीं है-
वस्तु अथवा सामग्री में दोष माने जाते हैं।
सामग्री का आशय
किसी भी प्रकार की चल सम्पत्ति (करेन्सी को छोड़कर) इसमें माल अथवा शेयर, उगी हुई फसल, घास या ऐसी चीजें जो जमीन से जुड़ी हुई हैं तथा जिन्हें बिक्री या बिक्री अनुबंध से पहले हटाया या काटा जा सकता है।
सेवा
सेवा से तात्पर्य किसी भी प्रकार की सेवा है जो उसके संभावित प्रयोगकर्ता को उपलब्ध कराई जाती है, इसके अंतर्गत बैंकिंग, बीमा, परिवहन, गृह निर्माण, रेलवे, बिजली, मनोरंजन, टेलीफोन, चिकित्सा आदि सभी प्रकार की सेवाएं सम्मिलित हैं। किन्तु इसके अन्तर्गत निःशुल्क या व्यक्तिगत सेवा संविदा के अधीन सेवा किया जाना नहीं है।
उपभोक्ताओं के कल्याण हेतु बनाए गए कुछ महत्वपूर्ण कानून
भारत सरकार ने उपभोक्ताओं के हितों को सुरक्षित रखने तथा उनके अधिकारों की रक्षा के लिए अनेक नियम और कानून बनाए हैं। उपभोक्ताओं की जानकारी के लिए यहां कुछ महत्वपूर्ण कानूनों की संक्षिप्त जानकारी दी जा रही है। यह निम्नलिखित प्रकार हैं :
भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872
धोखाधड़ी, जबरदस्ती, अवांछनीय प्रभाव अथवा भूलवश किए गए अनुबंधों को निष्प्रभावी मानते हुए उपभोक्ताओं को संरक्षण प्रदान करता है। यदि कोई ग्राहक उत्पाद की गुणवत्ता अथवा मूल्य के बारे में विक्रेता द्वारा ठगा जाता है तो वह ग्राहक इस सौदे के अनुबंध को समाप्त कर सकता है।
वस्तु बिक्री अधिनियम, 1930
यह अधिनियम वस्तुओं की बिक्री को नियमित करने के लिए निर्मित किया गया था, जिससे कि ग्राहक और विक्रेता दोनों के हितों की रक्षा हो सके। अधिनियम की धारा 14 से 17 में की गयी व्यवस्था के अनुसार खरीददार को सौदे से बचने व यदि सौदे की शर्तों का पालन नहीं होता है तो क्षतिपूर्ति का दावा करने का अधिकार है।
खाद्य अप-मिश्रण उन्मूलन अधिनियम, 1955
इसमें खाद्य पदार्थों में मिलावट रोकने तथा खाद्य पदार्थों की शुद्धता सुनिश्चित करने का प्रावधान किया गया है। अधिनियम के अनुसार, कोई उपभोक्ता या उपभोक्ता संघ क्रय की गयी खाद्य सामग्री का विश्लेषण लोक खाद्य विश्लेषक से करवा सकता है। विश्लेषक अपनी रिपोर्ट स्थानीय स्वास्थ्य अधिकारियों को भेजेगा और उसमें मिलावट पाए जाने पर मिलावटी सामान बेचने वाले व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
ट्रेड तथा मर्केन्डाइज अधिनियम, 1958
इसमें उपभोक्ता संरक्षण के लिए तथा ट्रेडमार्क संरक्षण की व्यवस्था की गयी है। नकली ट्रेडमार्क का प्रयोग रोकने के लिए इसमें व्यापक व्यवस्था की गयी हैं। माप तौल मानक अधिनियम, 1976 व्यापार में प्रयुक्त माप तौल संबंधी मानकों का निर्धारण करता है। इस अधिनियम का उद्देश्य उपभोक्ता के हितों की रक्षा करना है। डिब्बाबन्द सामग्री के विषय में इस अधिनियम में विद्गोष प्रावधान किए गये हैं, क्योंकि जो सामग्री 37 उपभोक्ता के अधिकार - एक विवेचन डिब्बाबन्द अवस्था में है उसके गुण, संखया, माप, तौल आदि के बारे में ग्राहक नहीं जान पाता है।
काला बाजारी अवरोधक एवं आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1980
इसका उद्देश्य काला बाजारियों, जमाखोरों एवं मुनाफाखोरों की धांधलियों को रोकना है। इसके अंतर्गत सरकार को यह अधिकार प्राप्त है, कि आवश्यक वस्तुओं के सप्लाई में बाधा पहुँचाने वाले व्यक्ति को वह गिरफ्तार कर सकती है तथा जेल भेज सकती है। जिसकी अवधि छह माह तक हो सकती है।
एकाधिकार एवं अवरोधक व्यापार व्यवहार (Monopolies and Resteuctive Trade Practices Act) अधिनियम,1969
एकाधिकार एवं अवरोधक व्यापार व्यवहार एवं प्रतियोगिता अधिनियम, 2002 द्वारा निजी एकाधिकार पर नियंत्रण रखा जाता है, क्योंकि यह राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के प्रतिकूल हो सकता है। इसका प्रमुख उद्देश्य बाजार में स्वतंत्रता एवं उचित प्रतियोगिता को सुनिश्चित करना है।
इसमें व्यवस्था है कि :
प्रतिस्पर्धा पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाली पद्धतियों को रोकेबाजार में प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दे और उसे सुदृढ़ करेउपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करेभारतवर्ष में अनेक बाजार भागीदारों को व्यापारिक स्वतंत्रता प्रदान करने संबंधी अन्य पहलुओं को व्यवस्थित करे।
यह अधिनियम प्रतिस्पर्धारोधी समझौतों को रोकने, व्यापारिक शक्ति के दुरुपयोग को रोकने एवं व्यापारिक समूहीकरण को संचालित करने के उद्देश्य से तैयार किया गया है।
स्रोत:- बिकासपीडिया,

रेल यात्री के अधिकार,

रेलवे स्टेशन पर समय सारणी का प्रदर्शन-
रेल अधिकारी हर स्टेशन पर समय सारणी तथा किराया चार्ट हिंदी, अंग्रेजी और संबंधित प्रांतीय भाषाओं में लगाते हैं।
रेल टिकट पर सूचना का विवरण-
रेल टिकट पर टिकट जारी करने की तिथि, यात्रा की श्रेणी, जाने और पहुंचने का स्थान, तथा राशि का विवरण होता है।
टिकट या पास का प्रदर्शन-
यात्रियों की जिम्मेदारी है कि वह यात्रा के दौरान या यात्रा समाप्त होने पर रेल अधिकारियों द्वारा मांगे जाने पर टिकट या पास की जांच कराएं।
रेल अधिकारी से अनुमति लेने के बाद कोई भी व्यक्ति रेल में यात्रा कर सकता है, लेकिन उसे यात्रा के दौरान पूरे किराए का भुगतान करना होगा।
संक्रामक रोग से ग्रस्त मरीज पर रोक-
संक्रामक रोग से ग्रस्त व्यक्ति रेलवे अधिकारी की आज्ञा के बिना रेल में यात्रा नहीं कर सकता है । वह अधिकारी मरीज के लिए अलग स्थान का प्रबंंध करेगा तथा रेलवे द्वारा निर्धारित अन्य शर्तों का भी पालन करेगा। यदि कोई ऐसा व्यक्ति बिना उचित आज्ञा के सफर करता है तो उस व्यक्ति और उसके साथी के टिकट को जब्त कर लिया जायेगा तथा उन्हें रेल से उतार दिया जायेगा।
अग्रिम आरक्षण की व्यवस्था-
यात्री भारतीय रेल के 520 कंप्यूटर आरक्षण केंद्र में से किसी भी केंद्र से किसी भी रेल के लिये कहीं से भी कहीं तक के लिेए टिकट आरक्षित करवा सकता है। यात्री यात्रा की तिथि को छोडक़र 90 दिन पहले टिकट आरक्षित करवा सकता है । हालांकि किसी बीच के स्टेशन पर जहां से वह रेल गुजरती है 61 दिन पहले ही आरक्षण हो सकता है ।
रेल में पहले दर्जे और वातानुकूलित पहले दर्जे के टिकट पर जहां केवल कन्फर्म लिखा होता है वहीं अन्य टिकटों पर डिब्बा तथा सीट नंबर भी लिखा होता है। जिस यात्री का टिकट कन्फर्म या आरएसी नहीं है , वह यात्री आरक्षित डिब्बे में सफर नहीं कर सकता है । ऐसा करने पर टीटीई उस पर जुर्माना कर सकता है और उसे रेल से भी नीचे उतार सकता है। यात्री अपने टिकट की ताजा जानकारी के लिए नजदीक के कंप्युटराइज्ड रेलवे स्टेशन से संपर्क कर सकता है। या फिर प्रमुख स्टेशनों पर प्राप्त इंटरएक्टिव वॉयस रेस्पॉन्स सिस्टम का फायदा उठा सकता है। इस सेवा के जरिए वह दस अंक के पीएनआर नंबर को कोट करके टिकट के स्टेट्स का पता लगा सकता है । 5 वर्ष से 12 वर्ष तक के बच्चों का आधा टिकट लगता है । ऐसे टिकटों पर आरक्षण भी कराया जा सकता है। 5 वर्ष से छोटे बच्चे का टिकट नहीं लेना होता है।आप यात्रा से चौबीस घंटे पहले तक अपने आरक्षित टिकट में परिवार-जनों के नाम बदल सकते हैं। इसके लिए आरक्षण पर्यवेक्षक को आवेदन करना होगा। कोई भी यात्री ट्रेन छूटने से 6 पहले  अतिरिक्त भुगतान करके अपनी यात्रा की तिथि आगे बढ़ा सकता है। जबकि यात्रा को टालने के लिए ट्रेन छूटने के समय से 24 घंटे पहले टिकट को समर्पित करना पड़ता है।
अधिकृत रेलवे एजेंटों को रेल विभाग द्वारा पहचान-पत्र दिए जाते हैं। वो आरक्षण आदि सेवाओं के लिए केवल निर्धारित शु्ल्क ही ले सकते हैं। सुपरफास्ट गाडिय़ों में कुछ अतिरिक्त अधिभार पड़ता है। इन गाडिय़ों की तादाद प्राय 2 से शुरु होती है। अगर कोई यात्री अपना आरक्षित टिकट घऱ पर भूला आया है तो उसे स्टेशन मास्टर को यह बात बताकर ट्रेन पर चढ़ जाना चाहिए। स्टेशन मास्टर अगले स्टेशन तक यह संदेश पहुंचा देगा जहां उक्त यात्री को नया टिकट दिया जा सकता है। अगर आपका आरक्षण ट्रेन के पहले स्टेशन से है और आप आगे के किसी स्टेशन से बैठना चाहते हैं तो आप शुरु के स्टेशन पर ट्रेन चलने से चौबीस घंटे पहले सूचना देकर ऐसा कर सकते हैं। अगर  संभव हो तो आरक्षण कराते समय ही यह सूचना दे दें। आपको यात्रा के उसे हिस्से के लिए कोई रकम वास नहीं मिलेगी, जिसकी यात्रा आपने नहीं की है। अगर आपका टिकट 500 किलोमीटर से ज्यादा लंबे सफर का है तो आप बीच में दो दिन यात्रा रोककर बाद में फिर आगे की यात्रा कर सकते हैं। पहला ब्रेक कम से कम 300 किलोमीटर की यात्रा के बाद होना चाहिए । आप टिकट चेक करने वाले स्टाफ के पास जाकर अपनी यात्रा के गन्तव्य स्थान के समाप्त होने से पहले या फिर समाप्त होने के बाद भी यात्रा का विस्तार कर सकते हैं। आपसे इसका किराया लिया जायेगा। अगर उच्च श्रेणी में सीट खाली है तो आप नीचे की श्रेणी के लिए आरक्षित टिकट को उच्च श्रेणी के लिए अपग्रेड करवा सकते हैं। इसके लिए आपको आरक्षण चार्ज तथा जो अंतर दोनों श्रेणी के किराए में है वह वसूला जायेगा।
आरक्षित टिकट के खो जाने पर भी आप उसी आरक्षण पर यात्रा कर सकते हैं। इसके लिए आपको अतिरिक्त किराया देना होगा-
500 किलोमीटर तक के सफर के लिए 25 फीसदी किराया।
500 किलोमीटर से ज्यादा सफर करने पर 10 फीसदी किराया, लेकिन 500 किलोमीटर के सफर के किराए की 25 फीसदी राशि के बराबर न्यूनतम किराया आपको अवश्य देना होगा।
राजधानी एक्सप्रेस जैसी किराए के भिन्न स्वरूप वाली गाडिय़ों में किराये का 25 प्रतिशत देना होगा। चाहे सफर कितनी ही दूरी का हो।
आरक्षण हस्तांतरिणीय नहीं है। इसलिये किसी दूसरे के नाम आरक्षित टिकट पर यात्रा नहीं करें।
आरक्षण न होने पर व्यवस्था-
अगर आपको जल्दी से गाड़ी पकडऩी है तो आप केवल प्लेटफॉर्म टिकट खरीदकर ट्रेन में चढ़ सकते हैं, लेकिन अपना टिकट खरीदने के लिए आपको ट्रेन में टीटीई के पास खुद जाना होगा।
अगर आपका नाम आरएसी सूची में तो आप आरक्षित डिब्बे में चढ़ सकते हैं और आपको बैठने की सीट अवश्य मिलेगी। बर्थ खाली होने पर प्राथमिकता क्रम के अनुसार आपको बर्थ मिल सकेगी, लेकिन अगर आपका टिकट प्रतीक्षा सूची का है तो आपको डब्बे में जाने का अधिकार नहीं है।
स्रोत:-बिकासपीडिया

चिकित्सा सेवा के क्षेत्र में उपभोक्ताओं के अधिकार

चिकित्सा सेवा के क्षेत्र में उपभोक्ताओं के अधिकार....
परिचय
भारत एक विकासशील देश है। यहाँ लगभग दो तिहाई आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है। जैसा कि हम सभी जानते हैं, कि अन्य सेवाओं की तरह चिकित्सा सेवाओं की स्थिति भी हमारे देश में बहुत अच्छी नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों में तो और भी बुरा हाल है। ग्रामीण जनता को अपने स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के निराकरण के लिए शहरों की तरफ भागना पड़ता है। कई बार तो उन्हें झोलाछाप डॉक्टरों की सेवाएं लेने को विवश होना पड़ता है। ऐसी स्थिति में उन्हें अनेकों बार अपनी मेहनत की कमाई गंवाने के साथ ही अपनी जान भी गंवानी पड़ती है। दूसरी तरफ, व्यावसायीकरण की अंधी दौड़ में शहरों सहित छोटे-छोटे कस्बों में भी प्राइवेट अस्पतालों एवं नर्सिंग होम खुलते जा रहे हैं। वहाँ सुविधाओं के नाम पर न तो प्रशिक्षित चिकित्सक होते हैं और न ही मरीजों की समुचित चिकित्सा के उपकरण। फिर भी वे विज्ञापनों के माध्यम से बड़े-बड़े दावे कर मरीजों को अपनी ओर आकर्षित करते रहते हैं और उनकी दुकानदारी चलती रहती है। मुँहमांगी कीमत देने के बाद भी उपभोक्ता इस बात के लिए आश्वस्त नहीं होता, कि उसे सही तथा पर्याप्त उपचार मिल पाएगा। ऐसी स्थिति में उपभोक्ताओं को शोषण से बचाने का एक मात्र रास्ता उन्हें जागरूक करना है।
चिकित्सा व्यवसाय ऐसा है जिसमें आम आदमी को चिकित्सीय पद्धतियों या दवाओं की जानकारी नहीं होती। वे पूरी तरह से अस्पताल व नर्सिंग होम के कर्मचारियों व चिकित्सकों पर निर्भर होते हैं। ऐसे में छोटी सी लापरवाही मरीज की जान ले सकती है। लेकिन क्या प्रत्येक मामले में चिकित्सक कोलापरवाही के लिए दोषी मानना ठीक है? यदि ऐसा हुआ तो कोई भी डॉक्टर अपने काम को तल्लीनता से नहीं कर पाएगा।
एक सजग उपभोक्ता के लिए यह जानना आवश्यक है कि एक चिकित्सक का कार्य किस प्रकार का होता है? मरीजों के प्रति चिकित्सक के कर्तव्य कौन-कौन से होते हैं? चिकित्सा व्यवसाय में लापरवाही कब मानी जाती है? एक डॉक्टर की ड्‌यूटी क्या होती है? इस सब बातों को हम निम्ललिखित बिन्दुओं में समझ सकते हैं :
लापरवाही क्या है?
सामान्य अर्थ में लापरवाही का आशय किसी काम को ठीक ढंग से न करना या असावधानी पूर्वक करना होता है। लेकिन कानून की नजर में केवल ठीक ढंग से काम न करना ही लापरवाही नहीं मानी जाती है।
कानून की नजर में लापरवाही
कानून की नजर में लापरवाही तब मानी जाएगी जब उसमें निम्नलिखित तीन बातें मौजूद हों-
जिम्मेदारी या ड्‌यूटीउल्लंघनक्षति या हानि
अर्थात्‌ जब कोई व्यक्ति (चिकित्सक) अपनी ड्‌यूटी या जिम्मेदारी का पालन ठीक ढंग से नहीं करता, लापरवाही पूर्वक करता है और उसके परिणामस्वरूप दूसरे व्यक्ति (मरीज) को क्षति या हानि पहुंचती है तो कानूनी दृष्टि से इसे लापरवाही मानी जाती है।
लापरवाही-टोर्ट और अपराध
लापरवाही को टोर्ट और अपराध दोनों माना गया है। टोर्ट के अन्तर्गत क्षतिपूर्ति के लिए सिविलन्यायालय में मुकदमें दायर किए जा सकते हैं और अपराध के रूप में फौजदारी न्यायालयों में ।
''उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986'' के अंतर्गत भी इस तरह के मामलों की शिकायत दर्ज करा कर क्षतिपूर्ति की मांग की जा सकती है।
नोट :
यहां इस बात का उल्लेख करना आवश्यक है, कि चिकित्सा में हुई लापरवाही के मामले में शिकायतकर्ता को यह साबित करना होगा कि विपक्षी पार्टी (चिकित्सक) की सतर्क रहने की ड्‌यूटी थी और उसने इस ड्‌यूटी का उल्लंधन किया जिसके परिणामस्वरूप शिकायतकर्ता या उसके परिजन को क्षति पहुंची है।
चिकित्सक की ड्‌यूटी
चिकित्सा सेवा प्रदान करने वाले एक डॉक्टर की निम्नलिखित ड्‌यूटी मानी गयी है :
सतर्कता बरतते हुए अपने कौशल और ज्ञान का उचित इस्तेमाल करनामरीज की जान बचाने और आपातकाल की स्थिति में उसकी हालत को स्थिर रखने के लिए अपने उचित विशेषज्ञता के साथ सेवा प्रदान करनायह निर्णय करने में उचित सावधानी बरतना कि उसे केस लेना चाहिए या नहींचिकित्सक को यह निर्णय लेने में भी सावधानी बरतनी चाहिए कि मरीज को कौन सा उपचार देना है और उसकी देख-रेख कैसे करनी हैअपने मरीज का ध्यान रखना तथा बिना बताए अपनी सेवाएं न हटानामरीजों की शिकायतों और रोग लक्षणों का सावधानी पूर्वक अध्ययन करना और मानक उपचार करनाउचित निदान के लिए आवश्यकता अनुसार उपयुक्त प्रयोगशाला परीक्षणों के माध्यम से जांच करवानाआवश्यकता होने पर मरीज को दूसरे डॉक्टर के पास जाने की सलाह और सहायता देनाजरूरत होने पर विशेषज्ञ चिकित्सक को बुलानाइलाज के दौरान होने वाले संभावित खतरे से मरीज या उसके परिजनों को सूचित करना तथा उनकी सहमति प्राप्त करनाइंजेक्शन और दवाईयाँ देने में सावधानी बरतनामरीज की बीमारी के बारे में संबंधित तथ्य मरीज को या उसके परिजनों को बतानाइलाज के दौरान मरीज से प्राप्त गोपनीय सूचना को गुप्त रखनाखतरनाक और संक्रामक बीमारियों की सूचना उपयुक्त प्राधिकारियों को देना
चिकित्सीय लापरवाही
जब कोई मरीज किसी डॉक्टर के पास उपचार के लिए जाता है, तो इस विश्वास के साथ जाता है, कि डॉक्टर उसके इलाज में उचित सावधानी बरतेगा। यदि डॉक्टर अपने कर्तव्य पालन में कोई लापरवाही करता है, जिसके परिणामस्वरूप मरीज को कोई क्षति या हानि हो जाती है तो डॉक्टर को इसके लिए जिम्मेदार माना जाएगा।
लेकिन, यदि डॉक्टर उचित सतर्कता बरतते हुए चिकित्सा व्यवसाय में स्वीकार्य पद्धति से किसी मरीज का उपचार करता है और मरीज को किसी प्रकार की क्षति या हानि हो जाती है, तो भी डॉक्टर को उसके लिए जिम्मेदार नहीं माना जाएगा।
दूसरे, शब्दों में कहें तो डॉक्टर को किसी मरीज का इलाज करने में अपने ज्ञान और कौशल का इस्तेमाल करते हुए उचित सतर्कता बरतना आवश्यक है।
सतर्कता बरतना डॉक्टर की ड्‌यूटी
जब कोई व्यक्ति (डॉक्टर) किसी मरीज को चिकित्सा सेवा देने और उपचार करने को तैयार होता है तो वह अंतर्निहित रूप से निम्नलिखित वचन देता है कि :
उसके पास उपचार के लिए उचित कौशल और ज्ञान हैडॉक्टर की यह ड्‌यूटी है कि केस उसे लेना चाहिए या नहीं इस बात में सतर्कता बरतेमरीज को क्या उपचार दिया जाए और उस उपचार को देने में सतर्कता बरतना भी डॉक्टर की ड्‌यूटी हैइन ड्‌यूटियों में से किसी एक ड्‌यूटी का उलंघन मरीज को यह अधिकार देता है कि वह लापरवाही के लिए डॉक्टर के खिलाफ कार्रवाई करे।
(लक्ष्मण बालकृष्ण जोशी बनाम त्रिम्बक बाबू गोंडबोले, ए.आई.आर. 1999 उच्चतम न्यायालय)
मरीज की देखभाल करना एक डॉक्टर का कानूनी कर्तव्य है। डॉक्टरी जाँच के समय मरीज व डॉक्टर के मध्य एक संविदा हो जाता है, कि मरीज का इलाज करने वाला डॉक्टर सावधानी बरतेगा। डॉक्टर द्वारा अपने कर्तव्यों का पालन न किए जाने पर, होने वाली क्षति के लिए डॉक्टर उत्तरदायी होंगे। डॉक्टर को मरीज की देखभाल करने के लिए सावधानी बरतने की आवश्यकता है। जब कोई व्यक्ति चिकित्सा सलाह देने और उपचार करने को तैयार हो जाता है तो वह एक तरह से वचन देता है, कि उसके पास इस हेतु कौशल व ज्ञान है तथा इसमें सतर्कता बरतना उसका कर्तव्य है। मरीज को क्या उपचार दिया जाएगा इस विषय पर सतर्कता बरतना भी इसमें सम्मिलित है। इसमें से किसी ड्‌यूटी का उल्लंघन मरीज को यह अधिकार प्रदत्त करता है, कि लापरवाही के लिए डॉक्टर के खिलाफ कार्रवाई करे। न्यायालयों द्वारा किए गए विभिन्न निर्णयों में यह स्पष्ट किया गया है कि एक डॉक्टर के लिए लापरवाही का क्या तात्पर्य है? न्यायालय के अनुसार, कोई डॉक्टर केवल इसलिए लापरवाह नहीं माना जा सकता कि मरीज के साथ कोई अप्रिय घटना घट गयी। डॉक्टर को दोषी केवल तभी माना जाएगा जब उसमें एक कुशल चिकित्सक के स्तर की कमीं हो या उसने ऐसा काम किया हो, कि उसके सहयोगी यह कहें कि वास्तव में इस मामले में लापरवाही की गयी। डॉक्टर द्वारा लापरवाही किए जाने के संबंध में निम्न तथ्य हो सकते हैं :
मरीज की उचित ढंग से जाँच पड़ताल करने में विफल होनागलत दवाईयाँ या इंजेक्शनन देनाअपने सहायकों को स्पष्ट और उचित निर्देश देने में विफल होना तथा उन पर निगरानी न रख पानामरीज का गलत ऑपरेशन कर देनागलत मरीज का ऑपरेशन करनाबिना एलर्जी का पता लगाए मरीज को दवा देनागलत ढंग से एनैसथिसिया देनाआपातकाल की स्थितियों से न निपट पाना, आदि।
अस्पताल एवं नर्सिंग होम की जिम्मेदारी
कोई अस्पताल एवं नर्सिंग होम, उनके अधीनस्थ कार्य कर रहे स्टॉफ या डॉक्टर की लापरवाही होने पर, मरीज, डॉक्टर या संबंधित नर्सिंग होम से क्षतिपूर्ति का दावा कर सकता है। अस्पताल के उत्तरदायित्व को स्पष्ट करते हुए न्यायालय ने कहा है, कि ''जब कभी किसी अस्पताल में किसी मरीज को इलाज के लिए लिया जाता है तो उस मरीज के प्रति सतर्कता बरतना उसका कर्तव्य हो जाता है। मरीज के इलाज के संबंध में कई काम ऐसे होते हैं जिसे अस्पताल के सहायकों द्वारा किया जाता है, सहायकों द्वारा की गयी लापरवाही के लिए संबंधित व्यक्ति के साथ-साथ अस्पताल प्रशासन पूर्णतया जिम्मेदार होता है।''
डॉक्टर पर लगने वाले लापरवाही के आरोप समाप्त हो सकते हैं यदि उसने जो कार्य किया है वह अनुमोदित पद्धति से किया गया है। डॉक्टर द्वारा लापरवाही करने पर आपराधिक और सिविल दोनों प्रकार की कार्रवाई की जा सकती है। भारतीय दण्ड संहिता की धारा 304 (क) के अन्तर्गत, आपराधिक लापरवाही के लिए किसी डॉक्टर को सजा दी जा सकती है। इसके अन्तर्गत जो कोई भी व्यक्ति आपराधिक मानव-वध की श्रेणी में आने वाला उतावलेपन या लापरवाही का कोई काम करके किसी व्यक्ति की हत्या करता है, उसे दो साल तक के कारावास या जुर्माने या दोनों की सजा हो सकती है। यह संज्ञेय, जमानत योग्य और गैर समझौता योग्य है अर्थात –
संज्ञेय : अपराधी को किसी पुलिस अधिकारी द्वारा बिना वारंट के गिरफ्तार किया जा सकता है।
योग्य : जिस व्यक्ति को गिरफ्तार किया जाता है वह जमानत पर छोडे़ जाने का हकदार है।
गैर समझौता योग्य : इस अपराध में संदेहास्पद अपराधी और पीड़ित व्यक्ति या उसके प्रतिनिधि के बीच समझौता नहीं किया जा सकता ।
चिकित्सीय विशेषाधिकार
कानूनी तौर पर चिकित्सकों को कुछ विशेषाधिकार प्राप्त हैं जो निम्नलिखित हैं :-
चिकित्सीय दृष्टि से आवश्यक होने पर, यदि डॉक्टर को मरीज की हालत का आकलन करने के बाद यह विश्वास हो जाता है कि तथ्य का खुलासा करने से मरीज के जान को खतरा पहुँच सकता है तो वह मरीज से संबंधित तथ्य की सूचना देने से मना कर सकता है।आपातकाल की स्थिति में डॉक्टर इलाज की पद्धति और उसके स्वरूप से संबधित सूचना देने से मना कर सकता है।
विशेष
यदि कोई मरीज डॉक्टर पर विश्वास करके यह कहता है, कि उसकी बीमारी के बारे में किसी अन्य को न बताया जाय तो डॉक्टर सूचना को न प्रकट करने के अपने विशेषाधिकार का इस्तेमाल कर सकता है।
किसी सूचनीय बीमारी से पीड़ित मरीज के मामले में सहमति लेना आवश्यक नहीं है। जैसे- एड्‌स एच.आई.बी. के मरीजों के मामले में उच्चतम न्यायालय ने व्यवस्था दी है, कि जब मरीज के होने वाले पति/पत्नी को एच.आई.बी. संक्रमण का खतरा हो तो डॉक्टर/अस्पताल की यह ड्‌यूटी होगी कि वह संबंधित व्यक्ति को खतरे की सूचना दे।
ऐसा न करने पर डॉक्टर/अस्पताल भारतीय दण्ड संहिता की धारा 269 और 270 के अंतर्गत अपराध के भागीदार माने जाएंगे।
चिकित्सा व्यवसाय को उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 की परिधि में लाने की संवैधानिक चुनौती
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के लागू होने से पूर्व उपभोक्ताओं की समस्याओं के प्रति समग्र दृष्टिकोण की कमीं थी। इस अधिनियम के लागू होने के पद्गचात उपभोक्ता न्यायालयों ने चिकित्सा सेवा में की गयी लापरवाही के सम्बन्ध में मरीजों या उनके प्रतिनिधियों से शिकायतें प्राप्त करना आरम्भ कर दीं। शिकायतकर्ताओं द्वारा उपभोक्ता न्यायालयों में विभिन्न दलीलें दी गयी, जैसे,- उनका मानना था कि अधिनियम के अन्तर्गत 'सेवा' शब्द का अर्थ यह है कि किसी प्रकार की ऐसी सेवा जो उसके संभावित प्रयोगकर्ता को उपलब्ध कराई जाती हैं। यह परिभाषा चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े लोगों पर भी लागू होने के लिए पर्याप्त है। शिकायतकर्ताओं की विभिन्न दलीलों पर न्यायालय ने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की संवैधानिक वैधता को न्यायोचित ठहराया और व्यवस्था दी कि डॉक्टर/अस्पताल और नर्सिंग होम अधिनियम के दायरे में आते हैं। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम चिकित्सा व्यवसाय पर कोई
अतिरिक्त दायित्व नहीं डालता। इस अधिनियम के पारित होने से पहले डॉक्टरों को सिविल न्यायालयों द्वारा डॉक्टरी लापरवाही के लिए क्षतिपूर्ति का जिम्मेदार माना जाता था।
चिकित्सा व्यवसाय को उपभोक्ता न्यायालयों की परिधि में लाने पर संबंधित व्यवसाय से जुड़े लोगों द्वारा आपत्ति जताई गयी और यह तर्क दिया गया, कि उपभोक्ता न्यायालयों के पास विशेषज्ञता नहीं है, इसलिए वे ऐसे मामलों पर निर्णय देने के लिए बाध्य नहीं हैं। उनका मानना था कि डॉक्टर आयुर्विज्ञान परिषदों के अनुशासनात्मक नियंत्रण में कार्य करते हैं और उन पर भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद/राज्य आयुर्विज्ञान परिषदों के तहत ही अनुशासनात्मक कार्रवाई की जानी चाहिए, अतः उन्हें उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के दायरे में लाने की कोई जरूरत नहीं है। इस पर एतराज दिखाते हुए उच्चतम न्यायालय ने इसे तर्कसंगत ढंग से नामंजूर कर दिया।
उपभोक्ता न्यायालयों में शिकायत दर्ज कराने के लिए आवश्यक बातें
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के अनुसार, उपभोक्ता फोरम में मामला दर्ज कराने की लिए शिकायतकर्ता का उपभोक्ता होना आवश्यक है-
क्या चिकित्सा सेवा प्राप्त करने वाला प्रत्येक मरीज उपभोक्ता है?
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के मुताबिक, यदि कोई व्यक्ति मूल्य देकर कोई वस्तु या सेवा प्राप्त करता है तो वह उपभोक्ता की श्रेणी में आता है। अतः उपभोक्ता फोरम में वही व्यक्ति शिकायत दर्ज करा सकता है, जो मूल्य अदा करके चिकित्सा सेवा प्राप्त किया हो।
चिकित्सा सेवाओं को बात की जाए तो हम उसे प्रमुख तीन श्रेणियों में विभक्त कर सकते हैं
जहाँ हर मरीज पैसा खर्च करके चिकित्सीय सेवाएं प्राप्त करता है।जहाँ सेवाएं निःशुल्क प्रदान की जाती हैं।जहाँ सेवाएं निःशुल्क प्रदान की जाती हैं, किन्तु उन सेवाओं के लिए कोई अन्य संस्था या व्यक्ति दान स्वरूप शुल्क देता है।
अतः पहले और तीसरे श्रेणी में आने वाले मरीज ही चिकित्सा सेवा में कमी या लापरवाही होने पर उपभोक्ता फोरम में शिकायत दर्ज करा सकते हैं।
संकलन स्रोत :- बिकासपीडिया

उपभोक्‍ता संरक्षण अधिनियम

उपभोक्‍ता संरक्षण अधिनियम
उपभोक्‍ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत अधिकार भारत के संविधान की धारा 14 से 19 बीच अधिकारों से आरंभ होते हैं। सूचना का अधिकार अधिनियम, जिससे हमारे देश में शासन प्रक्रिया में एक खुलापन आया है और साथ ही इसमें अब उपभोक्‍ता संरक्षण के लिए दूरगामी निहितार्थ शामिल हैं। अधिनियम के अनुसार 'उपभोक्‍ता' को निम्‍नानुसार परिभाषित किया है :
कोई व्‍यक्ति जो विचार हेतु सामान हेतु ख़रीदता हैं और कोई व्‍यक्ति जो बिक्री करने वाले की अनुमति से इन वस्‍तुओं का उपयोग करता है।
कोई व्‍यक्ति जो विचार हेतु कोई सेवा किराए पर लेता है और इन सेवाओं के कोई लाभार्थी, बशर्तें कि सेवा का लाभ उस व्‍यक्ति के अनुमोदन से लिया गया है जिसने विचार हेतु सेवाएं किराए पर ली थीं।
इसके अलावा किसी ऐसी वस्‍तु या सेवा को विचार में लेना जिसके लिए या तो भुगतान किया गया है अथवा इसका वचन दिया गया हैं या आंशिक भुगतान किया गया है अथवा वचन दिया गया है अथवा इसे एक आस्‍थगित भुगतान की प्रणाली के तहत प्रदान किया गया है।
इस अधिनियम में उपभोक्‍ताओं के निम्‍नलिखित अधिकारों के प्रवर्तन और संरक्षण की कल्‍पना की गई है
सुरक्षा का अधिकार
इसका अर्थ है वस्‍तुओं और सेवाओं के विपणन के विरुद्ध सुरक्षा प्रदान करना, जो जीवन और सम्‍पत्ति के लिए जोखिम पूर्ण है। ख़रीदी गई वस्‍तुएं और सेवाएं न केवल तात्‍कालिक आवश्‍यकताओं की पूर्ति करें बल्कि इनसे दीर्घ अवधि हितों की पूर्ति भी होनी चाहिए। ख़रीदने से पहले उपभोक्‍ताओं द्वारा वस्‍तुओं की गुणवत्ता पर जोर दिया जाना चाहिए और साथ ही उत्‍पाद तथा सेवाओं की गारंटी पर बल दिया जाना चाहिए। उन्‍हें वरीयत: गुणवत्ता चिन्‍ह वाले उत्‍पाद ख़रीदने चाहिए जैसे आईएसआई, एग मार्क आदि।
सूचना पाने का अधिकार
इसका अर्थ है वस्‍तुओं की मात्रा, गुणवत्ता, शक्ति, शुद्धता, स्‍तर और मूल्‍य के बारे में जानकारी पाने का अधिकार है ताकि अनुचित व्‍यापार प्रथाओं के विरुद्ध उपभोक्‍ता को सुरक्षा दी जा सके। उपभोक्‍ता द्वारा एक उत्‍पाद या सेवा के बारे में सभी जानकारी पाने पर बल दिया जाना चाहिए ताकि वह एक निर्णय या विकल्‍प के पहले इस पर विचार कर सकें। इससे उसे बुद्धिमानी और जिम्‍मेदारी से कार्य करने की क्षमता मिलेगी तथा वह उच्‍च दबाव वाली बिक्री तकनीकों का शिकार बनने से बच सकेगा।
चुनने का अधिकार
इसका अर्थ है आश्‍वस्‍त होने का अधिकार, जहाँ भी प्रतिस्‍पर्धी कीमत पर वस्‍तुओं और सेवाओं की किस्‍मों तक पहुंचना संभव हो। जहां किसी का एकाधिकार है, इसका अर्थ है संतोषजनक गुणवत्ता और सेवा का आश्‍वासन उचित मूल्‍य पर पाना। इसमें मूलभूत वस्‍तु और सेवाओं का अधिकार भी शामिल है। इसका कारण है अल्‍पसंख्‍यक वर्ग को चुनाव का अबाधित अधिकार देना ताकि वे इसके बड़े हिस्‍से में बड़े वर्ग को अस्‍वीकार कर सके। इस अधिकार का उपयोग प्रतिस्‍पर्धी बाज़ार में बेहतर रूप से किया जा सकता है, जहां अनेक प्रकार की वस्‍तुए प्रतिस्‍पर्धी कीमतों पर उपलब्‍ध हैं।
सुने जाने का अधिकार
इसका अर्थ है उपभोक्‍ताओं के हितों पर उपयुक्‍त मंचों में पर्याप्‍त ध्‍यान दिया जाएगा। इसमें उपभोक्‍ता कल्‍याण पर विचार करने हेतु गठित विभिन्न मंचों में अधिकारों का प्रतिनिधित्‍व भी शामिल है। उपभोक्‍ताओं द्वारा गैर राजनैतिक और गैर वाणिज्‍यक उपभोक्‍ता संगठन बनाए जाने चाहिए, जिन्‍हें सरकार और उपभोक्‍ताओं से संबंधित अन्‍य मामलों में निकायों द्वारा गठित विभिन्‍न समितियों में प्रतिनिधित्‍व दिया जा सके।
विवाद सुलझाने का अधिकार
इसका अर्थ है अनुचित व्‍यापार प्रथाओं या उपभोक्‍ताओं के गलत शोषण के विरुद्ध विवाद सुलझाने का अधिकार। इसमें उपभोक्‍ता की वास्‍तविक शिकायतों के उचित निपटान का अधिकार भी शामिल है। उपभोक्‍ताओं द्वारा अपनी वास्‍तविक शिकायतों के लिए शिकायत दर्ज कराई जानी चाहिए। कई बार शिकायत बहुत कम कीमत की होती है। समाज पर समाज पर कुल मिलाकर इसका गहरा प्रभाव होता है। इसमें उपभोक्‍ता संगठनों की सहायता से भी अपनी शिकायतों का निपटान किया जा सकता है।
उपभोक्‍ता शिक्षा का अधिकार
इसका अर्थ है पूरे जीवन उपभोक्‍ता को सूचित बने रहने का ज्ञान और कुशलता अर्जित करने का अधिकार। उपभोक्‍ताओं की उपेक्षा, विशेष रूप से ग्रामीण उपभोक्‍ताओं की, यह उनके शोषण के लिए मुख्‍य रूप से उत्तरदायी है। उन्‍हें अपने अधिकारों का ज्ञान होना चाहिए तथा इनका उपयोग अवश्‍य करना चाहिए। केवल तभी वास्‍तविक उपभोक्‍ता सुरक्षा सफलता पूर्वक प्राप्‍त की जाती है।
इस प्रकार उपभोक्‍ता संरक्षण की चिंता उचित व्‍यापार प्रथाओं को सुनिश्चित करने के साथ, वस्‍तुओं की गुणवत्ता और सूचित उपभोक्‍ता सहित प्रभारी सेवाओं से जुड़ी है जिन्‍हें अपनी रुचि की वस्‍तु की गुणवत्ता, मात्रा, शक्ति, बनावट और मूल्‍य की जानकारी हो। एक ऐसी उपभोक्‍ता संरक्षण नीति ऐसे परिवेश का सृजन करती है जिसके द्वारा ग्राहक और उपभोक्‍ता उनके लिए आवश्‍यक वस्‍तुओं तथा सेवाओं की आपूर्ति से संतोष प्राप्‍त करते हैं।
उपभोक्ताओं की परेशानियाँ
बढ़ते बाज़ारवाद के दौर में उपभोक्ता संस्कृति तो देखने को मिल रही है, लेकिन उपभोक्ताओं में जागरूकता की कमी है। आज हर व्यक्ति उपभोक्ता है, चाहे वह कोई वस्तु ख़रीद रहा हो या फिर किसी सेवा को प्राप्त कर रहा हो। दरअसल, मुना़फा़खोरी ने उपभोक्ताओं के लिए कई तरह की परेशानियां पैदा कर दी हैं। वस्तुओं में मिलावट और निम्न गुणवत्ता की वजह से जहां उन्हें परेशानी होती है, वहीं सेवाओं में व्यवधान या पर्याप्त सेवा न मिलने से भी उन्हें द़िक्क़तों का सामना करना पड़ता है। हालांकि भारत सरकार कहती है, जब आप पूरी क़ीमत देते हैं तो कोई भी वस्तु वज़न में कम न लें। बात सही है या नहीं, यह सुनिश्चित करने के लिए क़ानून है। यह स्लोगन सरकारी दफ्तरों में देखने को मिल जाएगा। सरकार ने उपभोक्ताओं को संरक्षण देने के लिए कई क़ानून बनाए हुए हैं, लेकिन इसके बावजूद उपभोक्ताओं से पूरी क़ीमत वसूलने के बाद उन्हें सही वस्तुएं और वाजिब सेवाएं नहीं मिल पा रही हैं।
उपभोक्ताओं की कुछ परेशानियाँ
सेहत के लिए नुक़सानदेह पदार्थ मिलाकर व्यापारियों द्वारा खाद्य पदार्थों में मिलावट करना या कुछ ऐसे पदार्थ निकाल लेना, जिनके कम होने से पदार्थ की गुणवत्ता पर विपरीत असर पड़ता है, जैसे दूध से क्रीम निकाल कर बेचना।
टेलीविजन और पत्र-पत्रिकाओं में गुमराह करने वाले विज्ञापनों के ज़रिये वस्तुओं तथा सेवाओं का ग्राहकों की मांग को प्रभावित करना।
वस्तुओं की पैकिंग पर दी गई जानकारी से अलग सामग्री पैकेट के भीतर रखना।
बिक्री के बाद सेवाओं को अनुचित रूप से देना।
दोषयुक्त वस्तुओं की आपूर्ति करना।
क़ीमत में छुपे हुए तथ्य शामिल होना।
उत्पाद पर ग़लत या छुपी हुई दरें लिखना।
वस्तुओं के वज़न और मापन में झूठे या निम्न स्तर के साधन इस्तेमाल करना।
थोक मात्रा में आपूर्ति करने पर वस्तुओं की गुणवत्ता में गिरावट आना।
अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) का ग़लत तौर पर निर्धारण करना।
एमआरपी से ज़्यादा क़ीमत पर बेचना।
दवाओं आदि जैसे अनिवार्य उत्पादों की अनाधिकृत बिक्री उनकी समापन तिथि के बाद करना।
कमज़ोर उपभोक्ताएं सेवाएं, जिसके कारण उपभोक्ता को परेशानी हो।
बिक्री और सेवाओं की शर्तों और निबंधनों का पालन न करना।
उत्पाद के बारे में झूठी या अधूरी जानकारी देना।
गारंटी या वारंटी आदि को पूरा न करना।[2]
उपभोक्ताओं के अधिकार
जीवन एवं संपत्ति के लिए हानिकारक सामान और सेवाओं के विपणन के खिला़फ सुरक्षा का अधिकार।
सामान अथवा सेवाओं की गुणवत्ता, मात्रा, क्षमता, शुद्धता, स्तर और मूल्य, जैसा भी मामला हो, के बारे में जानकारी का अधिकार, ताकि उपभोक्ताओं को अनुचित व्यापार पद्धतियों से बचाया जा सके।
जहां तक संभव हो उचित मूल्यों पर विभिन्न प्रकार के सामान तथा सेवाओं तक पहुंच का आश्वासन।
उपभोक्ताओं के हितों पर विचार करने के लिए बनाए गए विभिन्न मंचों पर प्रतिनिधित्व का अधिकार।
अनुचित व्यापार पद्धतियों या उपभोक्ताओं के शोषण के विरुद्ध निपटान का अधिकार।
सूचना संपन्न उपभोक्ता बनने के लिए ज्ञान और कौशल प्राप्त करने का अधिकार।
अपने अधिकार के लिए आवाज़ उठाने का अधिकार।
माप-तोल के नियम
हर बांट पर निरीक्षक की मुहर होनी चाहिए।
एक साल की अवधि में मुहर का सत्यापन ज़रूरी है।
पत्थर, धातुओं आदि के टुकड़ों का बांट के तौर पर इस्तेमाल नहीं हो सकता।
फेरी वालों के अलावा किसी अन्य को तराज़ू हाथ में पक़ड कर तोलने की अनुमति नहीं है।
तराज़ू एक हुक या छड़ की सहायता से लटका होना चाहिए।
लकड़ी और गोल डंडी की तराज़ू का इस्तेमाल दंडनीय है।
कपा मापने के मीटर के दोनों सिरों पर मुहर होनी चाहिए।
तेल एवं दूध आदि के मापों के नीचे तल्ला लटका हुआ नहीं होना चाहिए।
मिठाई, गिरीदार वस्तुओं एवं मसालों आदि की तुलाई में डिब्बे का वज़न शामिल नहीं किया जा सकता।
पैकिंग वस्तुओं पर निर्माता का नाम, पता, वस्तु की शुद्ध तोल एवं क़ीमत कर सहित अंकित हो। साथ ही पैकिंग का साल और महीना लिखा होना चाहिए।
पैकिंग वस्तुओं पर मूल्य का स्टीकर नहीं होना चाहिए।
स्रोत:-बिकासपीडिया,