सोमवार, 7 नवंबर 2016

अभिव्यक्ति की आज़ादी,

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 (1) में मौलिक अधिकारों के तहत नागरिकों को बोलने की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आज़ादी का प्रावधान किया गया है. बोलने की स्वतंत्रता लोकतंात्रिक सरकार के लिए कवच है. लोकतांत्रिक प्रक्रिया को सही तरीक़े से लागू करने के लिए इस तरह की स्वतंत्रता बेहद ज़रूरी है. यह स़िर्फ नागरिकों के मूलभूत अधिकारों को ही नहीं, बल्कि देश की एकता और एकरूपता को भी बढ़ावा देता है. हालांकि संविधान के अनुच्छेद 19(1) में जो स्वतंत्रता दी गई है, वह पूर्ण या काफी नहीं है. ये सभी अधिकार संसद या राज्यविधानसभा के बनाए क़ानूनों के तहत नियंत्रित, नियमित या कम करने के लिए जवाबदेह हैं. अनुच्छेद 19 के नियम (2) से (6) में उन आधारों और लक्ष्यों की व्याख्या है जिसके आधार पर इन अधिकारों को नियंत्रित किया जा सकता है.
लोकतांत्रिक प्रक्रिया को सुचारू रूप से चलाने के लिए बोलने की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आज़ादी बहुत ज़रूरी है और उसे आज़ादी की पहली शर्त माना जाता है. बोलने की स्वतंत्रता सभी अधिकारों की जननी है. सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक मुद्दों पर लोगों की राय बनाने के लिए बोलने की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आज़ादी महत्वपूर्ण है. मेनका गांधी बनाम भारतीय संघ के मामले में न्यायमूर्ति भगवती ने बोलने की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आज़ादी के महत्व पर ज़ोर देते हुए व्यवस्था दी थी कि-लोकतंत्र मुख्य रूप से स्वतंत्र बातचीत और बहस पर आधारित है. लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले देश में सरकार की कार्रवाई के उपचार के लिए यही एक उचित व्यवस्था है. अगर लोकतंत्र का मतलब लोगों का, लोगों के द्वारा शासन है, तो यह स्पष्ट है कि हर नागरिक को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेने का अधिकार होना ज़रूरी है और अपनी इच्छा से चुनने के बौद्धिक अधिकार के लिए सार्वजनिक मुद्दों पर स्वतंत्र विचार, चर्चा और बहस बेहद ज़रूरी है.
अनुच्छेद 19 (1) के तहत मिली अभिव्यक्ति की आज़ादी मेंकोई भी नागरिक किसी भी माध्यम के द्वारा, किसी भी मुद्दे पर अपनी राय और विचार दे सकता है. इन माध्यमों में व्यक्तिगत, लेखन, छपाई, चित्र, सिनेमा इत्यादि शामिल हैं. जिसमें संचार की आज़ादी और अपनी राय को सार्वजनिक तौर पर रखने और उसे प्रचारित करने का अधिकार भी शामिल है.
भारत में प्रेस की स्वतंत्रता को अनुच्छेद 19 के तहत मिली बोलने की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आज़ादी से ही लिया गया है. प्रेस की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए अलग से कोई प्रावधान नहीं है. सकाल अखबार बनाम भारतीय संघ के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि प्रेस की स्वतंत्रता की उत्पत्ति अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से ही हुई है. सुप्रीम कोर्ट ने कई मामलों में लोकतांत्रिक समाज में प्रेस की स्वतंत्रता को बनाए रखने पर ज़ोर दिया है. प्रेस तथ्यों और विचारों को प्रकाशित कर लोगों की रुचि बढ़ाकर एक ऐसी तार्किक विचारधारा उत्पन्न करता है जिसके बिना कोई भी निर्वाचक मंडल सही फैसला नहीं दे सकता.

प्रेस की स्वतंत्रता अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अभिन्न अंग है और लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए बहुत ही ज़रूरी है. भारतीय संविधान में यह स्वतंत्रता मौलिक अधिकार के रूप में दी गई है. प्रेस व्यक्तिगत अधिकारों को सम्मान देने और वैधानिक सिद्धांतों और क़ानूनों के अंतर्गत काम करने के लिए बाध्य है. ये सिद्धांत और क़ानून न्यूनतम मानकों को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिक महत्वपूर्ण सिद्धांतों में दखल नहीं देते हैं. मीडिया लोकतांत्रिक व्यवस्था का चौथा स्तंभ है. बाक़ी तीनों स्तंभों में, जहां विधायिका समाज के लिए क़ानून बनाती है, वहीं कार्यपालिका उसे लागू करने के लिए क़दम उठाती है, तीसरा महत्वपूर्ण स्तंभ न्यायपालिका है जो यह सुनिश्चित करती है कि सभी कार्रवाइयां और फैसले वैधानिक हों और उनका सही तरीक़े से पालन किया जाए. चौथे स्तंभ-यानी प्रेस को इन क़ानूनों और संवैधानिक प्रावधानों के अंदर रहकर सार्वजनिक और राष्ट्रीय हित में काम करना होता है. इससे यही संकेत मिलता है कि कोई भी क़ानून से ऊपर नहीं है. जब भारत के संविधान में नागरिकों के लिए संविधान में बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सुनिश्चित किया गया, तब यह भी सुनिश्चित किया गया कि यह स्वतंत्रता पूर्ण नहीं थी और कोई भी अभिव्यक्ति-चाहे वह शाब्दिक हो या दृश्य माध्यम से-वह विधायिका द्वारा बनाए गए और कार्यपालिका के द्वारा लागू किए गए संवैधानिक नियमों का उल्लंघन न करती हो. अगर प्रिंट या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर आकर काम करता है तो न्यायपालिका के पास उस पर मौलिक अधिकार उल्लंघन के तहत कार्रवाई का हक़ है.

प्रिंट, रेडियो और टीवी एक स्वस्थ लोकतंत्र विकसित करने के लिए लोगों को जागरूक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं. अनुच्छेद 19(2) के तहत रखे गए प्रावधानों में एक नागरिक को अपने विचार रखने, प्रकाशित करने और प्रचारित करने का अधिकार है, और इस अधिकार पर कोई भी रोक अनुच्छेद 19(1) के तहत ग़लत होगी. सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम मामले में दूरदर्शन को फटकार लगाई, जिसमें दूरदर्शन ने भोपाल कांड पर बने एक वृत्तचित्र (डाक्यूमेंटरी) को दिखाने से इंकार कर दिया था. दूरदर्शन के मुताबिक उस मामले की अब कोई प्रासंगिकता नहीं रह गई थी.
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को ख़ारिज़ कर दिया. पर इस मामले में न्यायालय ने कहा कि राज्य के प्रयासों को अयोग्यता और अधिकारियों के रवैए का चित्रण किसी राजनैतिक पार्टी पर हमला नहीं माना जा सकता, जब की गई आलोचना सही और स्वस्थ हो.
अभी हाल के दिनों में स्टिंग ऑपरेशन को लेकर बहुत सवाल उठे हैं. स्टिंग ऑपरेशन धोखे से किसी अपराधी को पकड़ने का तरीक़ा है. इसके लिए झूठे विश्वास और बड़ी चतुराई पर आधारित योजना बनाई जाती है, जिस पर बहुत ही सावधानी और सर्तकता के साथ अमल किया जाता है. स्टिंग शब्द की उत्पत्ति अमेरिका से हुई है. इसे वहां की पुलिस द्वारा अपराधियों को पकड़ने के लिए गुप्त योजना के अर्थ में प्रयोग किया जाता था. दूसरे शब्दों में इसे खोजी और गुप्त पत्रकारिता भी कह सकते हैं. स्टिंग ऑपरेशन असल में सूचना एकत्र करने का एक ऐसा तरीक़ा है जिसमें उस सूचना को प्राप्त किया जाता है जिसे हासिल करना दूसरी तरह से बहुत ही कठिन हो.

अगर देखा जाए तो बहुत घटनाओं में स्टिंग ऑपरेशन सरकार के काम करने के तरीक़ों का जायज़ा लेने के लिए किया जाता है या फिर किसी भी ऐसे व्यक्ति के ख़िला़फजिसका आचरण व्यवस्था केविरुद्ध हो. भारत में इस तरह के ऑपरेशन को नियंत्रित करने के लिए कोई विशेष क़ानून नहीं बनाया गया है और न ही इसके मार्गदर्शन के लिए कोई न्यायिक घोषणा ही है. लेेकिन कोई भी व्यक्ति विभिन्न क़ानूनों के तहत अपने अधिकारों और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए न्यायालय जा सकता है. 1996 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए एक ़फैसले के अनुसार वायरटैप का प्रयोग किसी कीनिजी ज़िंदगी में दखल देना है. कोर्ट ने सरकार द्वारा वायरटैपिंग के लिए दिशा-निर्देश जारी किए. इसमें यह बताया गया कि किन परिस्थितियों में और कौन फोन टैप कर सकता है. फोन टैप करने का आदेश स़िर्फ गृह सचिव और राज्य में उसके समकक्ष कोई अधिकारी ही दे सकता है. इसके अलावा सरकार को यह भी दिखाना होगा कि जो सूचना प्राप्त की जा रही है, उसे किसी दूसरे ज़रिए से प्राप्त नहीं किया जा सकता है.

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा कि पत्रकार स्टिंग ऑपरेशन के ज़रिए समाज में भ्रष्टाचार को उजागर करता है. केंद्रीय मंत्री और बीजेपी नेता दिलीप सिंह जूदेव के ख़िला़फ हुए एक स्टिंग ऑपरेशन से संबंधितमामले में सुनवाई के दौरान जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने कहा कि वह स्टिंग ऑपरेशन से पूर्णत: सहमत हैं. अधिक से अधिक स्टिंग ऑपरेशन होने चाहिए, जिससे भ्रष्ट लोगों को सामने लाया जा सके. साथ ही उन्होंने कहा कि जो स्टिंग ऑपरेशन कर रहा है उसके साथ अपराधीजैसा व्यवहार नहीं करना चाहिए. उसका उद्देश्य  स़िर्फ समाज में फैले भ्रष्टाचार को सामने लाना होता है. उन्होंने पूछा, वह अपराधी जैसा कैसे हो सकता है. काटजू के विचार भारत के मुख्य न्यायाधीश के जी बालकृष्णन की अध्यक्षता वाली एक दूसरी खंडपीठ के उलट हैं, जिसने एक चैनल के पत्रकार-जिसने गुजरात के एक अधीनस्थ कोर्ट में व्याप्त भ्रष्टाचार को उजागर किया-से बिना शर्त क्षमा मांगने के लिए कहा. 2004 में उस रिपोर्टर ने चार बड़ी हस्तियों-जिनमें पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम और भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश शामिल थे-के ख़िला़फ अहमदाबाद के कोर्ट से  ज़मानती वारंट जारी करा लिए थे. हालांकि जूदेव केस की सुनवाई कर रही पीठ के प्रमुख अलतमस कबीर ने कहा कि स्टिंग ऑपरेशन के दूसरे पहलू भी हैं, जिसका सबूत दिल्ली में एक शिक्षिका उमा खुराना के मामले में दिखा.

साभार :- चौथी दुनिया 

गुरुवार, 3 नवंबर 2016

मनोवैज्ञानिक रोचक तथ्य


मनोवैज्ञानिक रोचक तथ्य : कई बार दूसरों का तो छोड़िए, अपना ही व्यवहार हमारी समझ से परे हो जाता हैं. ये 42 रोचक तथ्य पढ़ने के बाद आप किसी को भी बहुत अंदर तक जान जाओगें.Psychology facts - मनोवैज्ञानिक रोचक तथ्य

1. यदि आप किसी को अपने गोल बता देते हो तो आपके सफ़ल होने की संभावना कम हो जाती हैं.. ऐसा इसलिए, Q कि आप motivation lose कर देते हैं.

2. हम जितना ज्यादा दूसरों पर खर्च करते हैं उतने ज्यादा खुश रहते हैं.

3. 90% लोग मैसेज़ में वो चीज़े लिखते हैं जिन्हें वो कह नही सकते.

4. आपका पसंदीदा गाना आपको इसलिए पसंद हैं Q कि वह आपकी ज़िंदगी की असल घटना के साथ जुड़ा हुआ होता हैं.

5. 18 से 33 साल की उम्र तक आदमी सबसे ज्यादा तनाव में रहता हैं.

6. किसी भी आदमी को प्यार में पड़ने के लिए सिर्फ़ 4 मिनट ही काफी होते हैं.

7. Comedian और मजाकिया लोग दूसरो के मुकाबले ज्यादा उदास रहते हैं.

8. आधे से ज्यादा समय आपका दिमाग केवल यादें दोहराता रहता हैं.



9. भावनाओं को छिपाओगें.. उस व्यक्ति के लिए उतना ही मुश्किल होगा आपको समझना.

10. यह भी संभव हैं, कि किसी की मौत दिल टूटने से हो इसे “Stress Cardiomyopathy” कहते हैं.

11. जब कोई हमें ignore करता हैं तो वही chemical रिलिज़ होता हैं जो चोट लगने पर होता हैं.

12. Smarter लोग खुद को कम मानते हैं लेकिन अनज़ान लोग उन्हें brilliant समझते हैं.

13. यदि आप पुराने समय को याद करते हैं तो उससे ज्यादा ये याद आता हैं कि इसे आखिरीं बार कब याद किया था. (Source : www.gazabhindi.com)

14. जितनी चिंता आजकल के बच्चे दिखाते हैं 1950 में उतनी चिंता तो दिमागी मरीज़ दिखाते थे.

15. जब किसी से प्यार होता हैं तो हमारा दिमाग इसमें कुछ नही करता करता बस एक chemical रिलिज़ होता हैं.

16. जब कोई कहता हैं कि आपसे एक प्रश्न पूछना हैं तो हाल ही में किए गए सारे बुरे काम एक मिनट के अंदर याद आ जाते हैं.

17. जो लोग ज्यादा हँसते हैं वो ज्यादा दर्द सहन कर सकते हैं.

18. हम जो सोचते हैं उसका 90% हिस्सा सीधा हमारे मूड पर असर करता हैं एक गलत विचार पूरे मूड को खराब कर सकता हैं.

19. लोग आपके बारे में अच्छा सुनने पर शक करते हैं लेकिन बुरा सुनने पर तुरंत यकीन कर लेते हैं.

20. किसी के साथ ज्यादा समय बिताने से आप उसकी आदतें अपनानें लगते हैं इसलिए सोच-समझकर दोस्त बनाएं.

21. इंसान के लिए सबसे मुश्किल कामों में से एक हैं.. खुद को ये समझाना कि अब मुझे किसी की परवाह नही हैं.

22. 90% लोगो का दिमाग ये सोचता हैं कि किश कुछ पल के लिए समय पीछे चला जाएं.

23. अगर कोई नाख़ून चबाता हैं तो इसका मतलब वह बहुत परेशान हैं.

24. फोन खो जाने पर होने वाली चिंता उस चिंता के समान होती हैं, जब व्यक्ति अपनी मौत के करीब होता हैं.

25. यदि कोई ज्यादा तकियें लेकर सोता हैं तो इसका मतलब वह खुद को अकेला महसूस करता हैं.

26. हम दिन की बज़ाय रात को आसानी से रो सकते हैं.

27. यदि आप किसी के बारे में जागते हुए भी सपने देखते हैं तो इसका मतलब हैं आप उसे मिस कर रहे हैं.

28. कोई बात छुपा रहा हैं या नही ये पता करने की भी एक ट्रिक हैं.. जिस चीज़ को वो छुपा रहा हैं उसी के बारे में बात करना शुरू कर दें ऐसा करने पर वह हड़बड़ा जाता हैं. आंखें चुराने लगता हैं और इसी घबराहट में या तो चुप रहता हैं या फिर बोलता भी हैं तो सामान्य से तेज़ गति से.

29. अगर एक व्यक्ति कम बोलता हैं, लेकिन तेजी से बोलता हैं- इसका मतलब हैं कि वह एक गोपनीय व्यक्तित्व वाला शख्स हैं, जो ज़्यादातर बातें अपने तक ही रखता हैं. (Source : www.gazabhindi.com)

30. अगर कोई छोटी-छोटी बात पर गुस्सा हो जाता हैं, इसका मतलब उसे आपके साथ और प्यार की जरूरत हैं.

31. अगर किसी पुरुष को किसी की बात से तकलीफ पहुंची हो, तो वो उस बात को भूल जाते हैं, लेकिन माफ़ नहीं करते। लेकिन अगर एक महिला को किसी की बात से तकलीफ पहुंची हो, तो वो माफ़ कर देती हैं, लेकिन भूलती नहीं.

32. अगर कोई छोटी-छोटी बात पर रोता हैं, इसका मतलब हैं कि वह नरम दिल स्वभाव का हैं.

33. जो लोग अपने प्रियजनों के सामने फ़ोन की स्क्रीन को नीचे की तरफ रखते हैं, तो उनके मन में खोट हो सकता हैं.

34. अगर एक व्यक्ति बहुत सोता हैं तो इसका मतलब हैं कि वह अंदर ही अंदर घुट रहा हैं और किसी बात से दुःखी हैं.

35. अगर कोई रो नहीं सकता, इसका मतल़ब कि वो इंसान भावनात्मक रूप से कमज़ोर हैं रोना एक व्यक्ति को कमज़ोर नहीं, बल्कि भावनात्मक रूप से मज़बूत बनाता हैं. (Source : www.gazabhindi.com)

36. अगर कोई असामान्य तरीके से खाना खाता हैं इसका मतलब हैं कि वह किसी बात को लेकर बहुत चिंतित हैं.

37. आपका दिमाग लोगो की बोरिंग बातो को री-राईट कर उन्हें मज़ेदार बना सकता हैं.

38. आप जिस तरह के गाने सुनते हैं उसी तरह से आप दुनिया को देखने लग जाते हैं.

39. तुम बेश्क ये Article Online पढ़ रहें हैं लेकिन हमारी आंखे खुश नही हैं Mobile की स्क्रीन से बहुत आसान होता हैं किताबों में पढ़ना.

40. सोने से पहले आप जिस आदमी के बारे में सोचते हैं वही आपकी खुशी और दर्द का कारण हैं.

41. हम किसी भी चीज़ को असलियत में करते समय इतने खुश नही होते जितनें बादें उन्हें याद करते समय होते हैं.

42. खुशी का पहला आंसू दाहिनी आँख से और दुख का पहला आंसू बाईं आँख से निकलता हैं.

संकलित 

इस्लाम,खिलाफत और इस्लामी पंथ,

हर धर्म का मर्म होता है हिंदुत्व का मर्म है दया,करुना,शांति,त्याग, उसी तरह इस्लाम का भी अपना मर्म है, मुहम्मद इस्लाम के प्रवर्तक थे, उनसे पहले अरब में मूर्ति पूजा होती थी, मुहम्मद  का अर्थ होता है जिस की अत्यन्त प्रशंसा की गई हो” मुहम्मद साहब ने मक्का में अपने ही खानदान के चचरे भाइयो से (बद्र की लड़ाई) बिजयी युद्ध कर जिस धर्म को खड़ा किया वह आज तक अनवरत हिंसा में लिप्त है, अपने खालिफे ओहदे के लिय एक दुसरे के खून के प्यासे रहे, मुहम्मद सभी मुसलमानों के लिये आदरणीय रहे, उन्होंने अपने जीते जी अपना उतराधिकारी घोषित किया जिन्हें खलीफा कहा गया, जिनका प्रमुख उध्येस्य दुनिया पर इस्लाम का राज कायम करना था/है, खलीफा सबसे बड़ा इस्लामिक ओहदा आज भी है, मुहम्मद साहब ने अपने से बड़ी अमीर बिधवा औरत “खदीजा बिन्त खुवायलद” से पहला बिवाह किया इन्ही यहाँ वह रोजगार किया करते थे, बाद में उन्होंने उनके सम्पदा को इस्लाम के प्रचार प्रसार में लगाया, मुहम्मद साहब ने कुल तेरह शादियाँ की जिसमे छह साल की “आयशा बिन्त अबी बक्र” तक उनकी पत्नियाँ रही, गौरतलब है की मुहम्मद की सबसे प्यारी पत्नी आयसा के पिता अबूबकर इस्लाम के पहले खलीफा बने, यही आयसा बाद में मुस्लिमों में बिभाजन का कारन बनी और मुसल्मान शिया सुन्नी में बंटे, फिर दुसरे खलीफा बने (उमर इब्न अल-खतब) उमर, इनकी छह पत्नियाँ थी, उमर शुरू में बुत परस्ती करते थे, वे मक्का में एक समृद्ध परिवार से थे, वे मुसलमानों को पसन्द नहीं करते थे ना ही मुहम्मद साहब के मिशन को, बाद में यह अपने बहन और बहनोई के समझने पर मुसलमान बन गए और मुहम्मद साहब के बिस्वास पात्र साथी भी, उमर का साथ मिलने से मुहम्मद साहब की ताकत में इजाफा हुआ और इस्लाम को फ़ैलाने में भरपूर मदद मिला, उन्हें अबुबकर ने खलीफा बनवाया अबू बकर ने तीसरे खलीफा को भी खुद ही चुना क्युकी वह अली से नफरत करते थे,
तीसरे खलीफा थे उस्मान वो एक धनी व्यापारी थे, बाद में वह मुहम्मद साहिब के दामाद और उनके प्रमुख साथी बने, इनकी नव पत्नियाँ थी, इन्होने ही क़ुरान को संकलित कर पुस्तक का रूप दिया, लेकिन दुर्भाग्य मदीना में भीड़ ने कुरान से छेड़ छाड के आरोप में इनका क़त्ल कर दिया
और चौथे थे अली, अली मुहोम्मद के चचेरे भाई और सगे दामाद थे, इस कारन उनका मानना था की मुहम्मद के बाद उन्हें ही उनके बाद का स्थान मिलना चाहिए था, लेकिन बाकियों को यह मंजूर नहीं था उनका युध्ह मुहम्मद की पत्नी आयसा से हुआ, जिसमे अली की जित हुई और आयसा की मौत हुई, लेकिन ज्यादातर मुसलमान आयसा के साथ थे और यही से अली के समर्थक शिया(शिया का अर्थ होता है अली की टोली वाले) हो गए और बाकि सुन्नी, शिया मुसलमानों का मानना है कि पहले तीन खलीफ़ा इस्लाम के गैर-वाजिब प्रधान थे और वे हज़रत अली से ही इमामों की गिनती आरंभ करते हैं, इस्लाम में शुरुवाती चार खालिफवो का प्रमुख स्थान है जिन्हें राशिदुन कहा जाता है अर्थात सही मार्ग पर चलने वाला, मजेदार बात यह है की जिन चारो को सही रास्ते वाला बताया गया इनमे तिन खालिफवों को तो मुसलमानों द्वारा ही मार दिया गया, इन खलीफा के बाद हुए उम्मयद फिर अब्बासी फिर उस्मानी, 1924 में तुर्की के शासक कमाल पाशा ने खिलाफ़त का अन्त कर दिया और तुर्की को एक गणराज्य घोषित कर दिया। लेकिन आज फिर से बगदादी को खलीफा मान ISIS अपना खुनी खेल खेल रहा है,

मुसलमानों में कई पंथ है हनफ़ी पन्थ- इसके अनुयायी दक्षिण एशिया और मध्य एशिया में हैं। मालिकी पन्थ-इसके अनुयायी पश्चिम अफ्रीका और अरब के कुछ भागों में हैं।शाफ्यी पन्थ-इसके अनुयायी अफ़्रीका के पूर्वी अफ्रीका, अरब के कुछ भागों और दक्षिण पूर्व एशिया में हैं। हंबली पन्थ- इसके अनुयायी सऊदी अरब में है, शिया और सुन्नी के झगरे को तो सब जानते है,अहमदिया,बरेलवी देवबंदी,बोहरा,मुस्लमान भी देश में पाए जाते है,
अहमदिय्या समुदाय मुहम्मद को अन्तिम नबी नहीं मानता फिर भी स्वयं को इस्लाम का अनुयायी कहता है और संयुक्त राष्ट्र द्वारा स्वीकारा भी जाता है हालांकि कई इस्लामी राष्ट्रों में उसे मुस्लिम मानना प्रतिबंधित है। भारत के उच्चतम न्यायालय के अनुसार उनको भारत में मुसलमान माना जाता है,
बहाई भी इस्लाम से ही निकला,सय्यद अली मुहम्मद शिराज़ी इसके संथापक थे.. जिन्होंने अपने आपको पैगम्बर घोषित किया और नया धर्म ही चला दिया.. बाद में आखिर उनको मार डाला गया..
कादियानी (अहमदिया): ये भी इस्लाम का ही एक अंग है.. मिर्ज़ा गुलाम अहमद इसके संस्थापक हैं और इन्होने भी अपने आपको पैगम्बर घोषित किया,
नियाजी मुस्लिम: ये पन्थ शमा नियाजीद्वारा स्थापित किया है.. उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गावं में.. आज इनके मानने वालों की संख्या लाखों में है.. ये पंथ काबा को आदम की कब्र मानता है..
वहाबी इस्लाम: सऊदी अरब और अन्य इस्लामिक देशो में ये मत ही सर्वोपरि है.. भारत में इसका केंद्र देवबंद है.. ये मत अपने आपको ही असली इस्लाम बताता है बाकी अन्य किसी भी इस्लामिक मत को ये नहीं मानता है.. इनमे अल्लाह पहले आता है बाकी सब कुछ उसके बाद, आज बहावी ही आतंक और कट्टरता के सबसे बड़े पोषक है,
इन सभी मुसलमानों की अलग अलग मस्जिदे है, अलग अलग रिवाज है,




इस्लाम,खिलाफत और इस्लामी पंथ,

हर धर्म का मर्म होता है हिंदुत्व का मर्म है दया,करुना,शांति,त्याग, उसी तरह इस्लाम का भी अपना मर्म है, मुहम्मद इस्लाम के प्रवर्तक थे, उनसे पहले अरब में मूर्ति पूजा होती थी, मुहम्मद  का अर्थ होता है जिस की अत्यन्त प्रशंसा की गई हो” मुहम्मद साहब ने मक्का में अपने ही खानदान के चचरे भाइयो से (बद्र की लड़ाई) बिजयी युद्ध कर जिस धर्म को खड़ा किया वह आज तक अनवरत हिंसा में लिप्त है, अपने खालिफे ओहदे के लिय एक दुसरे के खून के प्यासे रहे, मुहम्मद सभी मुसलमानों के लिये आदरणीय रहे, उन्होंने अपने जीते जी अपना उतराधिकारी घोषित किया जिन्हें खलीफा कहा गया, जिनका प्रमुख उध्येस्य दुनिया पर इस्लाम का राज कायम करना था/है, खलीफा सबसे बड़ा इस्लामिक ओहदा आज भी है, मुहम्मद साहब ने अपने से बड़ी अमीर बिधवा औरत “खदीजा बिन्त खुवायलद” से पहला बिवाह किया इन्ही यहाँ वह रोजगार किया करते थे, बाद में उन्होंने उनके सम्पदा को इस्लाम के प्रचार प्रसार में लगाया, मुहम्मद साहब ने कुल तेरह शादियाँ की जिसमे छह साल की “आयशा बिन्त अबी बक्र” तक उनकी पत्नियाँ रही, गौरतलब है की मुहम्मद की सबसे प्यारी पत्नी आयसा के पिता अबूबकर इस्लाम के पहले खलीफा बने, यही आयसा बाद में मुस्लिमों में बिभाजन का कारन बनी और मुसल्मान शिया सुन्नी में बंटे, फिर दुसरे खलीफा बने (उमर इब्न अल-खतब) उमर, इनकी छह पत्नियाँ थी, उमर शुरू में बुत परस्ती करते थे, वे मक्का में एक समृद्ध परिवार से थे, वे मुसलमानों को पसन्द नहीं करते थे ना ही मुहम्मद साहब के मिशन को, बाद में यह अपने बहन और बहनोई के समझने पर मुसलमान बन गए और मुहम्मद साहब के बिस्वास पात्र साथी भी, उमर का साथ मिलने से मुहम्मद साहब की ताकत में इजाफा हुआ और इस्लाम को फ़ैलाने में भरपूर मदद मिला, उन्हें अबुबकर ने खलीफा बनवाया अबू बकर ने तीसरे खलीफा को भी खुद ही चुना क्युकी वह अली से नफरत करते थे,
तीसरे खलीफा थे उस्मान वो एक धनी व्यापारी थे, बाद में वह मुहम्मद साहिब के दामाद और उनके प्रमुख साथी बने, इनकी नव पत्नियाँ थी, इन्होने ही क़ुरान को संकलित कर पुस्तक का रूप दिया, लेकिन दुर्भाग्य मदीना में भीड़ ने कुरान से छेड़ छाड के आरोप में इनका क़त्ल कर दिया
और चौथे थे अली, अली मुहोम्मद के चचेरे भाई और सगे दामाद थे, इस कारन उनका मानना था की मुहम्मद के बाद उन्हें ही उनके बाद का स्थान मिलना चाहिए था, लेकिन बाकियों को यह मंजूर नहीं था उनका युध्ह मुहम्मद की पत्नी आयसा से हुआ, जिसमे अली की जित हुई और आयसा की मौत हुई, लेकिन ज्यादातर मुसलमान आयसा के साथ थे और यही से अली के समर्थक शिया(शिया का अर्थ होता है अली की टोली वाले) हो गए और बाकि सुन्नी, शिया मुसलमानों का मानना है कि पहले तीन खलीफ़ा इस्लाम के गैर-वाजिब प्रधान थे और वे हज़रत अली से ही इमामों की गिनती आरंभ करते हैं, इस्लाम में शुरुवाती चार खालिफवो का प्रमुख स्थान है जिन्हें राशिदुन कहा जाता है अर्थात सही मार्ग पर चलने वाला, मजेदार बात यह है की जिन चारो को सही रास्ते वाला बताया गया इनमे तिन खालिफवों को तो मुसलमानों द्वारा ही मार दिया गया, इन खलीफा के बाद हुए उम्मयद फिर अब्बासी फिर उस्मानी, 1924 में तुर्की के शासक कमाल पाशा ने खिलाफ़त का अन्त कर दिया और तुर्की को एक गणराज्य घोषित कर दिया। लेकिन आज फिर से बगदादी को खलीफा मान ISIS अपना खुनी खेल खेल रहा है,

मुसलमानों में कई पंथ है हनफ़ी पन्थ- इसके अनुयायी दक्षिण एशिया और मध्य एशिया में हैं। मालिकी पन्थ-इसके अनुयायी पश्चिम अफ्रीका और अरब के कुछ भागों में हैं।शाफ्यी पन्थ-इसके अनुयायी अफ़्रीका के पूर्वी अफ्रीका, अरब के कुछ भागों और दक्षिण पूर्व एशिया में हैं। हंबली पन्थ- इसके अनुयायी सऊदी अरब में है, शिया और सुन्नी के झगरे को तो सब जानते है,अहमदिया,बरेलवी देवबंदी,बोहरा,मुस्लमान भी देश में पाए जाते है,
अहमदिय्या समुदाय मुहम्मद को अन्तिम नबी नहीं मानता फिर भी स्वयं को इस्लाम का अनुयायी कहता है और संयुक्त राष्ट्र द्वारा स्वीकारा भी जाता है हालांकि कई इस्लामी राष्ट्रों में उसे मुस्लिम मानना प्रतिबंधित है। भारत के उच्चतम न्यायालय के अनुसार उनको भारत में मुसलमान माना जाता है,
बहाई भी इस्लाम से ही निकला,सय्यद अली मुहम्मद शिराज़ी इसके संथापक थे.. जिन्होंने अपने आपको पैगम्बर घोषित किया और नया धर्म ही चला दिया.. बाद में आखिर उनको मार डाला गया..
कादियानी (अहमदिया): ये भी इस्लाम का ही एक अंग है.. मिर्ज़ा गुलाम अहमद इसके संस्थापक हैं और इन्होने भी अपने आपको पैगम्बर घोषित किया,
नियाजी मुस्लिम: ये पन्थ शमा नियाजीद्वारा स्थापित किया है.. उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गावं में.. आज इनके मानने वालों की संख्या लाखों में है.. ये पंथ काबा को आदम की कब्र मानता है..
वहाबी इस्लाम: सऊदी अरब और अन्य इस्लामिक देशो में ये मत ही सर्वोपरि है.. भारत में इसका केंद्र देवबंद है.. ये मत अपने आपको ही असली इस्लाम बताता है बाकी अन्य किसी भी इस्लामिक मत को ये नहीं मानता है.. इनमे अल्लाह पहले आता है बाकी सब कुछ उसके बाद, आज बहावी ही आतंक और कट्टरता के सबसे बड़े पोषक है,
इन सभी मुसलमानों की अलग अलग मस्जिदे है, अलग अलग रिवाज है,




इस्लाम,खिलाफत और इस्लामी पंथ,

हर धर्म का मर्म होता है हिंदुत्व का मर्म है दया,करुना,शांति,त्याग, उसी तरह इस्लाम का भी अपना मर्म है, मुहम्मद इस्लाम के प्रवर्तक थे, उनसे पहले अरब में मूर्ति पूजा होती थी, मुहम्मद  का अर्थ होता है जिस की अत्यन्त प्रशंसा की गई हो” मुहम्मद साहब ने मक्का में अपने ही खानदान के चचरे भाइयो से (बद्र की लड़ाई) बिजयी युद्ध कर जिस धर्म को खड़ा किया वह आज तक अनवरत हिंसा में लिप्त है, अपने खालिफे ओहदे के लिय एक दुसरे के खून के प्यासे रहे, मुहम्मद सभी मुसलमानों के लिये आदरणीय रहे, उन्होंने अपने जीते जी अपना उतराधिकारी घोषित किया जिन्हें खलीफा कहा गया, जिनका प्रमुख उध्येस्य दुनिया पर इस्लाम का राज कायम करना था/है, खलीफा सबसे बड़ा इस्लामिक ओहदा आज भी है, मुहम्मद साहब ने अपने से बड़ी अमीर बिधवा औरत “खदीजा बिन्त खुवायलद” से पहला बिवाह किया इन्ही यहाँ वह रोजगार किया करते थे, बाद में उन्होंने उनके सम्पदा को इस्लाम के प्रचार प्रसार में लगाया, मुहम्मद साहब ने कुल तेरह शादियाँ की जिसमे छह साल की “आयशा बिन्त अबी बक्र” तक उनकी पत्नियाँ रही, गौरतलब है की मुहम्मद की सबसे प्यारी पत्नी आयसा के पिता अबूबकर इस्लाम के पहले खलीफा बने, यही आयसा बाद में मुस्लिमों में बिभाजन का कारन बनी और मुसल्मान शिया सुन्नी में बंटे, फिर दुसरे खलीफा बने (उमर इब्न अल-खतब) उमर, इनकी छह पत्नियाँ थी, उमर शुरू में बुत परस्ती करते थे, वे मक्का में एक समृद्ध परिवार से थे, वे मुसलमानों को पसन्द नहीं करते थे ना ही मुहम्मद साहब के मिशन को, बाद में यह अपने बहन और बहनोई के समझने पर मुसलमान बन गए और मुहम्मद साहब के बिस्वास पात्र साथी भी, उमर का साथ मिलने से मुहम्मद साहब की ताकत में इजाफा हुआ और इस्लाम को फ़ैलाने में भरपूर मदद मिला, उन्हें अबुबकर ने खलीफा बनवाया अबू बकर ने तीसरे खलीफा को भी खुद ही चुना क्युकी वह अली से नफरत करते थे,
तीसरे खलीफा थे उस्मान वो एक धनी व्यापारी थे, बाद में वह मुहम्मद साहिब के दामाद और उनके प्रमुख साथी बने, इनकी नव पत्नियाँ थी, इन्होने ही क़ुरान को संकलित कर पुस्तक का रूप दिया, लेकिन दुर्भाग्य मदीना में भीड़ ने कुरान से छेड़ छाड के आरोप में इनका क़त्ल कर दिया
और चौथे थे अली, अली मुहोम्मद के चचेरे भाई और सगे दामाद थे, इस कारन उनका मानना था की मुहम्मद के बाद उन्हें ही उनके बाद का स्थान मिलना चाहिए था, लेकिन बाकियों को यह मंजूर नहीं था उनका युध्ह मुहम्मद की पत्नी आयसा से हुआ, जिसमे अली की जित हुई और आयसा की मौत हुई, लेकिन ज्यादातर मुसलमान आयसा के साथ थे और यही से अली के समर्थक शिया(शिया का अर्थ होता है अली की टोली वाले) हो गए और बाकि सुन्नी, शिया मुसलमानों का मानना है कि पहले तीन खलीफ़ा इस्लाम के गैर-वाजिब प्रधान थे और वे हज़रत अली से ही इमामों की गिनती आरंभ करते हैं, इस्लाम में शुरुवाती चार खालिफवो का प्रमुख स्थान है जिन्हें राशिदुन कहा जाता है अर्थात सही मार्ग पर चलने वाला, मजेदार बात यह है की जिन चारो को सही रास्ते वाला बताया गया इनमे तिन खालिफवों को तो मुसलमानों द्वारा ही मार दिया गया, इन खलीफा के बाद हुए उम्मयद फिर अब्बासी फिर उस्मानी, 1924 में तुर्की के शासक कमाल पाशा ने खिलाफ़त का अन्त कर दिया और तुर्की को एक गणराज्य घोषित कर दिया। लेकिन आज फिर से बगदादी को खलीफा मान ISIS अपना खुनी खेल खेल रहा है,

मुसलमानों में कई पंथ है हनफ़ी पन्थ- इसके अनुयायी दक्षिण एशिया और मध्य एशिया में हैं। मालिकी पन्थ-इसके अनुयायी पश्चिम अफ्रीका और अरब के कुछ भागों में हैं।शाफ्यी पन्थ-इसके अनुयायी अफ़्रीका के पूर्वी अफ्रीका, अरब के कुछ भागों और दक्षिण पूर्व एशिया में हैं। हंबली पन्थ- इसके अनुयायी सऊदी अरब में है, शिया और सुन्नी के झगरे को तो सब जानते है,अहमदिया,बरेलवी देवबंदी,बोहरा,मुस्लमान भी देश में पाए जाते है,
अहमदिय्या समुदाय मुहम्मद को अन्तिम नबी नहीं मानता फिर भी स्वयं को इस्लाम का अनुयायी कहता है और संयुक्त राष्ट्र द्वारा स्वीकारा भी जाता है हालांकि कई इस्लामी राष्ट्रों में उसे मुस्लिम मानना प्रतिबंधित है। भारत के उच्चतम न्यायालय के अनुसार उनको भारत में मुसलमान माना जाता है,
बहाई भी इस्लाम से ही निकला,सय्यद अली मुहम्मद शिराज़ी इसके संथापक थे.. जिन्होंने अपने आपको पैगम्बर घोषित किया और नया धर्म ही चला दिया.. बाद में आखिर उनको मार डाला गया..
कादियानी (अहमदिया): ये भी इस्लाम का ही एक अंग है.. मिर्ज़ा गुलाम अहमद इसके संस्थापक हैं और इन्होने भी अपने आपको पैगम्बर घोषित किया,
नियाजी मुस्लिम: ये पन्थ शमा नियाजीद्वारा स्थापित किया है.. उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गावं में.. आज इनके मानने वालों की संख्या लाखों में है.. ये पंथ काबा को आदम की कब्र मानता है..
वहाबी इस्लाम: सऊदी अरब और अन्य इस्लामिक देशो में ये मत ही सर्वोपरि है.. भारत में इसका केंद्र देवबंद है.. ये मत अपने आपको ही असली इस्लाम बताता है बाकी अन्य किसी भी इस्लामिक मत को ये नहीं मानता है.. इनमे अल्लाह पहले आता है बाकी सब कुछ उसके बाद, आज बहावी ही आतंक और कट्टरता के सबसे बड़े पोषक है,
इन सभी मुसलमानों की अलग अलग मस्जिदे है, अलग अलग रिवाज है,




हिन्दू धार्मिक प्रसंग की गलत ब्याख्या

इस्लाम को मानाने वाले अपनी कमियों को छुपाने के लिये अक्सर हिदू धर्म के सन्दर्भ दिया करते है,
कहा जाता है की हिन्दुओ में भी एकेस्वरवाद का वर्णन है, तो बता दू हिन्दू चिंतन में सर्वेस्वर्वाद की चर्चा ज्यादा है, सर्वेश्वरवाद, ईश्वर और जगत् में अभिन्नता मानता है। उसके सिद्धांतवाक्य हैं- 'सब ईश्वर हैं' तथा 'ईश्वर सब हैं'। एकेश्वरवाद केवल एक ईश्वर की सत्ता मानता है। सर्वेश्वरवाद ईश्वर और जगत् दोनों की सत्ता को मानता है,
मुसलमानों द्वारा कहा जाता है की ब्रम्हां जी ने अपनी पुत्री सरस्वती से बिवाह कर लिया था, सर्वप्रथम तो देवी सरस्वती की कोई माँ नहीं थी ब्रह्मा ने ही उनका निर्माण किया इसलिय ब्रम्हा ही उनके माता और पिता कहलाये ब्रह्मा को अपनी ही रचना इतनी भाई की वे उस पर आसक्त हो गए, यह कोई अनहोनी न थी, फिर भी ब्रह्मः के इस कृत्य को अनैतिक माना गया और उन्हें सजा स्वरुप अपूज्य घोषित कर दिया गया, ब्रह्मा और सरस्वती से जो जन्मे वे मनु थे और मानव सभ्यता के प्रथम वाहक, ब्रह्मा द्वारा प्रकट होने के कारण मनु स्वयंभू कहलाये। आगे चल कर कई मनु हुए,

मुसलमानों द्वारा कहा जाता है की श्री कृष्ण की 16000 पत्नियाँ थी, लेकिन जो सत्य है की श्री कृष्ण कि केवल एक ही पत्नी थी रुक्मणि, 16000 पत्नियों की कहानी है की कृषण ने जब नरकासुर का बध किया तो उसके कैद में 16000 औरते थी, जो आजाद होने पर खुश तो थी पर उनकी चिंता थी की उनका भरण पोषण अब कौन करेगा, उन्हें कौन अपनाएगा और सहारा देगा तब कृष्ण ने उन्हें अपनाया और उनका जीवन सुरक्षित किया उन्हें सम्मान दिया,

झूठी धर्मनिरपेक्षता

मैंने यह कुछ पोस्ट सेकुलर दोस्तों के लिये लिखा है जो अपने धर्म में खूब बुराइयाँ देखते है,
हमारे धर्म में धर्म का अर्थ बताया गया है धारण करना, अब यह आप के ऊपर है आप क्या धारण करते है, जब कोई होली वाटर छिड़कवाता है तब वह इसाई बनता है, जब कोई खतना करवाता है तब वह मुसलमान बनता है हिन्दू होने के लिये बस खुद को हिन्दू मान लेना भर पड़ता है,
आज पूरी दुनियाभर में मात्र एक कड़ोर यहूदी बचे है, वे यहूदी जिनका धर्म इब्राहिमी था और जिससे ही इसाई और इस्लाम धर्म की उत्पति हुई, जिस प्रकार से हिन्दू धर्म में मनु की संतानों को मानव कहा गया है, वैसे ही इस्लाम में आदम की संतानों को आदमी कहा जाता है, आदम को ईसाईयत में एडम कहते हैं, जब सब एक जैसे ही ठहरे तो फीर धर्म परिवर्तन क्यों ? क्यों आपको आपके मन्यतावो के हिसाब से जीने देने को कोई मना करता है ?
आज अरब के खंडहर हमें हमारा भविष्य दिखलाते है, कश्मीर, केरल, पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान हमें आगाह करते है, हम आँख मुंद कर अपना जीवन तो बिता लेंगे लेकिन हमारी आने वाली पीढियों का क्या ? बर्मा में शांतिप्रिय बौध हिंसा पर उतारू है, मुट्ठी भर यहूदी सदियों से इन्हें लोहे के चने चबवा रहे है, जिनके प्रवर्तक सलीब पर चढ़े,प्यासे मर गयें वे बिस्तावादी है, और जबकि हमारे प्रवर्तक योध्हा थे, शसस्त्र थे हम शांतिप्रिय है, मिट रहे है, अगर हमारे पूर्वज भी कट्टर हुए होते तो आज हम अपनी ही भूमि पर अपनों से पराये हुए लोगो से संघर्ष की नौबत में न रहते,

इस्कान जैसी संस्थाओ से जुड़ कर गोरे हमारे कृष्ण को अपने गिरिजाघरो में रख रहे है, तो प्रगतिशील हिन्दू भी अब चर्च हो आते है, हमें भी अच्छे मुस्लमान पसंद है लेकिन उनकी समस्या है वे धार्मिक कट्टरता का खुल कर बिरोध नहीं करते, हमारी तरह अपने धर्म की बुराइयों पर चर्चा करना नहीं चाहते, ऐसा प्रतीत होता है की चाहे अनचाहे वे मुस्लिम जिहाद और खिलाफत का मौन समर्थन करते है, उनके लिये उनका मजहब सर्वोपरि है एडजस्ट होने का ठेका तो हमने ले रक्खा है,और इसी को वे/हम सेकुलरिज्म भी मानते है,