शुक्रवार, 16 अगस्त 2013

संघर्ष


कविता ...राजनीति


बरोदा के पुराना छात्र भुचुंग सोनम की कविताः

मेरे पास सिद्धांत है और कोई सत्ता नहीं 
तुम्हारे पास सत्ता है और कोई सिद्धांत नहीं 
तुम तुम हो 
मै मै हूं 
समझोते का सवाल ही नहीं 
तो शुरू होने दो युद्ध 
मेरे पास सत्य है और कोई ताकत नहीं 
तुम्हारे पास ताकत है और कोई सत्य नहीं 
तुम तुम हो 
मै मै हूं समझोते का सवाल ही नहीं 
तो शुरू होने दो युद्ध
तुम कुचल सकते हो मेरा सर 
मै लडूंगा 
तुम कुचल सकते हो मेरी हड्डियों
मै लडूंगा 
जिन्दा दफना सकते हो मुझे 
मै लडूंगा 
अपनी नसों मे दोरते हुए सत्य के साथ 
मै लडूंगा 
अपनी रत्ती रत्ती ताकात भर 
मै लडूंगा 
उखरती हुई अपनी आखरी साँस तक 
मै लडूंगा 
तब तक लडूंगा मै 
जब तक जमींदोज नहीं हो जाता 
तुम्हारे झूठो से बना हुआ किला 
जब तक की तुम्हारे झूठो से पूजा हुआ सैतान 
घुटने नहीं टेक देता सत्य के मेरे फरिस्ते के सामने

गुरुवार, 15 अगस्त 2013

अदम गौंडवी की रचना

उतरा है रामराज विधायक निवास में। 

पक्के समाजवादी हैं, तस्कर हों या डकैत
इतना असर है ख़ादी के उजले लिबास में। 

आजादी का वो जश्न मनाएं तो किस तरह
जो आ गए फुटपाथ पर घर की तलाश में। 

पैसे से आप चाहें तो सरकार गिरा दें
संसद बदल गयी है यहां की नख़ास में। 

जनता के पास एक ही चारा है बगावत
यह बात कह रहा हूँ मैं होशो-हवास में।
-अदम गौंडवी

अदम गौंडवी
गजल
पहले जनाब कोई शिगूफा उछाल दो।
फिर कर का बोझ कौम की गर्दन पे डाल दो।
रिश्वत को हक समझ जहां ले रहे हों लोग,
है और कोई मुल्क तो उसकी मिसाल दो।
औरत तुम्हारे पाँव की जूती की तरह है,
जब बोरियत महसूस हो घर से निकाल दो।
चीनी नहीं है घर में लो मेहमान आ गए,
महंगाई की भट्टी पे शराफत उबाल दो।

आनंद ताम्रकार की रचना

                                                                        करवाचौथ


कल रात नर छिपकली ने मादा छिपकली से कहा –
तूने आज मेरी लंबी आयु की कामना के लिए
उपवास नहीं रखा ?
ज़रा इंसानी समाज की बीवियों को देख
वो अपने पति के लिए
करवाचौथ का व्रत रख रही हैं
और यहाँ एक तू है
कि आज भी अपने शिकार को तक रही है।


इस पर मादा छिपकली बोली –
क्यों इसमें नाराज़गी की क्या बात है
और वैसे भी वो तो इंसानी ज़ात है
मैं उनकी तरह नहीं कर सकती
तुम्हारी खातिर मैं भूखी नहीं मर सकती
तुम क्यों इंसानी समाज की तुलना
अपने समाज से कर रहे हो
कहीं तुम भी तो इंसान नहीं बन रहे हो
इंसानी समाज में बहुत तबाही है
कहीं चोरी, डकैती, कहीं पैसा उगाही है


और तो और जो पत्नी
अपने पति की लंबी उम्र के लिए
उपवास रख रही है
वही पत्नी अपने उसी पति के हाथों
दहेज की बलि चढ़ रही है
अगर तुम भी उसी इंसानी सभ्यता को अपनाओगे
तो तुम्हारा क्या भरोसा
एक दिन शिकार की तलाश में
मुझे भी निगल जाओगे


जब इंसानी समाज में व्रत रखने वाली नारी का
सत्कार नहीं होता
तो अच्छा ही है कि हमारी कम्यूनिटी में
करवाचौथ नाम का
कोई त्यौहार नहीं होता।

इरोम शर्मिला की कुछ कविताये


(यह जानते हुए भी कि शब्‍दों की कविता शब्‍दों से बाहर निरर्थक है)


इरोम:एक

कौन है
जो सुन रहा है
इस पृथ्‍वी पर 
अकेला मौन तुम्‍हारा
अकेली चीख तुम्‍हारी.

इरोम:दो

यह हतप्रभ वितान
सुनता है तुम्‍हारी आंखों से कहे जा रहे
उन तमाम दृश्‍य कथाओं को
जो घट रहे हैं उसी के समक्ष
मानवता को शर्मनाक कलंक में बदलते

सुनो इरोम
सब देख सुन रहे हैं
     अपनी क्रूर आंखों और प्रमुदित कानों से
कोई असम्‍मानित कर रहा है अपनी मुस्‍कराहट
कोई जान रहा है केवल समाचार

तुम्‍हारे साथ ही खडे हैं ये समस्‍त शब्‍द
     भाषा और लिपि की वेशभूषा से बाहर
अपने होने की एकमात्र सार्थकता लिए हुए

इसलिए
और इसीलिए
शब्‍दों का सुरक्षा कवच बन गया है यह ब्रम्‍हाण्‍ड
और हम सबके हाथ
पयार्वरण बन अडिग तैनात हैं तुम्‍हारे पास

तुम हो
और केवल तुम ही रहोगी
अनवरत
हम सबकी आर्तनाद करती अबोध आवाज

इरोम: तीन

ग्रह और राशियॉं भी
डरते होंगे तुम्‍हारी देह के निकट आने को
नजर को खुद नजर लग चुकी होगी
     मौसम का चक्र भी खूब समझता होगा
तुम्‍हारी देह के लिए नहीं है बदलना उसका

तुम जहॉं हो
वहाँ तुम्‍हें देखने के लिए
प्रतिबंध लगा होगा तारों पर भी
बिना तुम्‍हारे पुर्णिमा
खुद ही ढ़ल जाती होगी अमावस्‍या में

कितनी चिडियाओं ने बनाए होंगे घर
कि तुम देखोगी एक मर्तबा उन्‍हें
     खेतों में उगी धान की बालियॉं
होड लगाती होंगी अपनी चुहल में
तुम्‍हारी देह में समाहित होने के लिए

तुम्‍हारी देह भी सोचती होगी
     सहेलियों फूलों और बरसात के प्रति
निष्‍ठुरता तुम्‍हारी
चुप हो जाती होगी फिर
तुम्‍हारे अपने बनाए मौसम का साम्राज्‍य देखकर

तुम समय में नहीं जी रही हो इरोम
समय तुम में जी रहा है
अपनी बेबस गिड़गिड़ाहट के साथ
हम सब देख पा रहे हैं
कंपकपाते समय के समक्ष
तुम्‍हारी निश्‍छल अबोध मुस्‍कराहट


     इरोम:चार

     कितना कुछ शेष है अभी
     भला-भला और खूबसूरत सा

     किसी गिलहरी की चपलता जैसा
     गुम हो जाना है समय की क्रूरता

     तर-बतर होना है तुम्‍हें
     खांगलेई की बरसात में
     बचपन की सहेलियों के साथ

     हवाओं की सरपट बहती इच्‍छाओं में
     शामिल हो जाना है तुम्‍हें
     तराइयों में टहलने के लिए
     कांग्‍ला फोर्ट में बैठकर
     पुनर्जन्‍म लेना है
     मणिपुर की शाश्‍वत नाभि से

     इसी जन्‍म में
     गले मिलना है बहुत देर तक
     अपनी माँ से
     सुबकती हुई खुशी के साथ

     बहुत कुछ शेष है अभी
     अशेष हो जाने के लिए

     इरोम:पांच

     एक इरोम शर्मिला है
     एक और मीरा है

     एक मणिपुर है
     एक और कृष्‍ण है

     एक समय है
     एक और बाँसुरी है
     एक विष का प्‍याला है
     एक और साजिश है

     एक कविता है
     केवल यही थोड़े से शब्‍द हैं.